रविवार, 7 मार्च 2010

स्वयंसिद्धा (अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस आठ मार्च पर विशेष )

माता बन ममता दान किया . बन बहन कवच का काम किया .
प्रेयसी बन प्यार लुटाती है . पत्नी बन सेज सजाती है .
सुकुमार है वो -कमजोर नहीं . शर्मीली है -मुहंचोर नहीं .
करती है जो सिंह सवारी . नाम है उसका जग में नारी .
लाल किया तारीख का पन्ना. लक्ष्मी -रज़िया ,चाँद -चेन्नमा .
आज कमर कसकर निकली है कलियुग में फिर दुर्गा .
समर में स्वयं को सिद्ध करे जो , कहलाती स्वयंसिद्धा .
गीतकार -- सतीश मापतपुरी
मोबाइल - 9334414611

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें