माता बन ममता दान किया . बन बहन कवच का काम किया .
प्रेयसी बन प्यार लुटाती है . पत्नी बन सेज सजाती है .
सुकुमार है वो -कमजोर नहीं . शर्मीली है -मुहंचोर नहीं .
करती है जो सिंह सवारी . नाम है उसका जग में नारी .
लाल किया तारीख का पन्ना. लक्ष्मी -रज़िया ,चाँद -चेन्नमा .
आज कमर कसकर निकली है कलियुग में फिर दुर्गा .
समर में स्वयं को सिद्ध करे जो , कहलाती स्वयंसिद्धा .
गीतकार -- सतीश मापतपुरी
मोबाइल - 9334414611
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